Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
चिदेवेयं शिलाकारमवतिष्ठति बिभ्रती ।
अङ्गमस्या जगज्जालं मरुतः स्पन्दनं यथा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
शिला की आकृति धारण कर रही यह
चिति ही स्थित है, इसी चिति के समस्त जगत् ऐसे अंग हैं, जैसे वायु के स्पन्दन