Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
चिच्छिलेयमनाद्यन्ता साद्यन्तास्तीति बोधतः ।
साकारापि निराकारा जगदङ्गेति संस्थिता ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो चितिरूपा शिला है, वह वास्तव मेँ आदि-अन्त से रहित होती हुई
भी भ्रम से आदि-अन्त से युक्त बन जाती है ओर निराकार होती हुई भी साकार होकर जगत्-रूप
अंगों से युक्त बनकर स्थित हो जाती है