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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 70, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 70, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 70 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

यद्वत्स्वप्ने चिदेव स्वं रूपं व्योमैव पत्तनम् । वेत्ति तद्वदिदं वेत्ति पाषाणं जगदङ्गकम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न मेँ चिति अपने ही आकाशवत्‌ निर्मल स्वरूप को नगररूप समझ लेती है, वैसे ही इस जाग्रत-काल में भी चिति पाषाण को अपना जगत्‌-रूप अंग समझ लेती है