Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
ओंकारार्धोऽर्धमात्रान्तः शान्तनिःशेषमानसः ।
लिपिकर्मार्पिताकार आसीदाशान्तवेदनः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, ओंकार की उत्तरार्धभूत जो आधी मात्रा है, उसमें विद्यमान
नाद, बिन्दु आदि भागों में क्रमशः उन्होने अपने चित्त का लय किया, इससे उनकी जितनी वासनां
थीं, वे सब विलीन हो गई, जबकि उनकी समस्त वासनां विनष्ट हो गई, तब वे ऐसे मालूम पड़ने
लगे, जैसे चित्र मेँ उनका आकार चित्रित किया गया हो यानी उस समय उनके आकार में तनिक भी
चंचलता नहीं थी