Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
बृहद्गिरिवनव्रातप्राणिमण्डलमण्डिताः ।
उड्डामरवनेमेन्द्रभेरीवादनभासुरैः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
समुद्रो मेँ कोई अनोखी ही शोभा उस समय मालूम होने लगी थी, उनमें बड़े-बड़े
पर्वत, वनों के समूह तथा अनेक प्राणी डूब रहे थे, यानी इन सबका समुद्रो मे जमघट हो जाने से
कुछ अपूर्व ही शोभा मालूम पड़ रही थी तथा उड़ रहे उत्तम मृत हाथियों के फूले हुए शरीर रूपी नगारे
समुद्र अपनी तरगों से बजा रहे थे