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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

यावत्संकल्पनं तस्य विरसीभवति क्षणात् । तथैवाशु तथैवोर्व्याः साद्रिद्वीपपयोनिधेः ॥ ५ ॥ तृणगुल्मलताशालिसमुद्भवनशक्तता । समस्तैवास्तमागन्तुमारब्धा च शनैःशनैः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी का संकल्प धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों उस क्षण से लेकर नीरस होता गया, त्यों- त्यों तत्क्षण में ही पर्वत, द्वीप एवं समुद्रों से युक्त पृथ्वी की तृण, गुल्म, लता, धान आदि की उत्पादन-सामर्थ्य एवं सभी जल आदि की अपनी अपनी सामर्थ्य विनाश की ओर जाने लगी