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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 71, Verses 7–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 71, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 7,8

संस्कृत श्लोक

किल तस्य विराडात्मरूपस्याङ्गैकदेशताम् । सा बिभर्ति मही तेन तदसंवेदनोदयात् ॥ ७ ॥ विचेतना सा विरसा बभूव परिजर्जरा । मार्गशीर्षान्तवल्लीव जराविधुरतां गता ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अंग है, इसलिए जब विराट्‌ आत्मा के संवेदन का उपसंहार हो गया, तब पृथ्वी अचेतन तथा नीरस होकर चारों ओर से ऐसे जर्जर हो गई, जैसे मार्गशीर्ष के अन्त में बेली जरा से अविधुर-भाव को (जर्जरभाव को) प्राप्त होती है