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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

तत्स्वामाकाशतां चैतच्चेत्यमित्यवबुध्यते । स्वरूपमत्यजन्नित्यं चित्त्वाद्भवति चेतनम् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी परमाकाश ने अपने असली स्वरूप का अपरित्याग कर यानी स्वयं विकार को न प्राप्त होकर ही अपनी अवकाशरूपता की ऐसे कल्पना की, जैसे चन्द्र ने द्वितीय चन्द्ररूप की । इसी से उसने चेत्य को अपने से भिन्न वस्तु समझी ओर चिद्रूप होने से वह चेतन भी हुआ