Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
विद्धि तच्चेतनं जीवं सघनत्वान्मनः स्थितम् ।
एतावति स्थितिजाले न किंचित्साकृति स्थितम् ॥ १४ ॥
शुद्धं व्योमैव चिद्व्योम स्थितमात्मनि पूर्ववत् ।
यदेतत्प्रतिभातं तु तदन्यत्र शिवात्ततः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, बोध्य,
बोध ओर बोद्धरूप (ज्ञेय, ज्ञान ओर ज्ञातारूप) त्रिपुटी के मनन से घनीभूत बन जाने के कारण मन
का वेष धारणकर स्थित हुआ वह चेतन जीव ही है, यह आप जानिये । त्रिपुटी तक का जितना
अभ्यास से उत्पन्न हुआ स्थिति जाल है, उतने के हो जाने पर भी उनमें कुछ भी परस्पर अलग-
अलग हो जानेवाला साकाररूप नहीं हैं, किन्तु विशुद्ध चिदाकाश ही है । यह चिदाकाश ही पहले
की नाई अपने स्वरूप में ही विद्यमान है इसलिए यह जो दिखाई पडनेवाला जगत् है, वह
शिवस्वरूप परमात्मा से अलग कुछ भी नहीं है