Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
वेत्ति भावितमाकारं पश्यत्यनुभवत्यपि ।
संकल्पकात्मकं शून्यमेव देह इति स्थितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यही जिस आकार की भावना करता है, उसे जानता है, देखता
है और अनुभव भी करता है, वास्तव में संकल्पात्मक शून्य ही देह के रूप में स्थित है