Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
शून्यमेव यथाकारि संकल्पनगरं भवान् ।
पश्यत्येवमजो देहं खे खमेवानुभूतवान् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि देह शून्य है. तो वह साकार कैसे अनुभूत होगी, इस पर कहते हैं /
भद्र, जैसे आप शून्यस्वरूप संकल्पनगर को साकार देखते हैं, वैसे ही ब्रह्मा भी शून्य में
शून्यरूप आकाश को देहरूप ही देखता है, क्योकि उसने ऐसा ही अनुभव किया है