Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
संविदो निर्मलत्वात्स यावदित्थं तथाविधम् ।
अनुभूयानुभवनं स्वेच्छयैवोपशाम्यति ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रलय ओर मोक्ष आदि की कल्पना भी ऐसी ही असत् है, यह कहते हैं /
संवित् आत्मा स्वयं तो निर्मल है, इसलिए इस प्रकार के जगत् का जब तक अनुभव करने
की इच्छा रखता है, तब तक उस प्रकार का अनुभव कर फिर उसे अपनी इच्छा से स्वयं ही
शान्त कर देता है