Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
सर्वमाकाशमेवेदं संकल्पकलनात्मकम् ।
वस्तुतस्त्वस्ति न जगत्त्वत्तामत्ते न च क्वचित् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा जाग्रदुन्मुखता मे स्वप्न के देहांगों के उपहार से कैसे स्वप्न के भूमि आदि लोकों का
उपहार हो जाता है, वैसे ही उन पृथ्वी आदि का उपसंहार हुआ, क्योकि दोनों ही सकल्याकाशरूप
हैं. इस आशय से कहते हैं ।
सभी कल्पनात्मक यह जगत् संकल्पाकाशस्वरूप ही है, अतः वस्तुतः कहीं न जगत् की सत्ता
है और न कहीं त्वत्ता-मत्ता की यानी अहन्ता और ममता की ही सत्ता है