Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अतोऽलीकमिदं जातमलीकं परिदृश्यते ।
अलीकं स्वदतेऽलोकमेवं पश्यति शून्यकम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए यह
असत् ही उत्पन्न हुआ है, असत् ही देखा जाता है और असद्रूप ही जगत् प्रिय-अप्रियरूपसे
प्रकाशता है । इस तरह निष्पक्ष ब्रह्म ही भ्रान्ति से जगत्-रहित आकाश को असत् जगत के रूप
में देखता है