Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 72, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 72, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
जगदादिकया भासा चिन्मात्रं स्वदते स्वतः ।
आत्मनात्माम्बरे द्वैते स्पन्दनेनेव मारुतः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस्रीको विस्पष्ट रूप में कहते हैं /
चिन्मात्र ब्रह्म ही धर्मी जगत् एवं उत्पत्ति आदि धर्मो के भास से स्वयं स्वतः प्रियाप्रियरूप
से प्रकाशित होता है । जैसे वायु से स्पन्दन होता है, वैसे ही अपने से ही अद्वैत चिदाकाश
में जगत् के रूप में स्पन्दित होता है