Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
उपलब्धं विदुर्द्रव्यं द्रष्टृताप्युपलब्धता ।
आलोकनं दर्शनता दृगालोकनकारणम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उसी समय तिपुटी का विभाग करनेवाली उपाधियों की, साक्षी की एवं उसके प्रकाश में हेतुभ्रूत
पदार्थ की कल्पना भी हो जाती है, यह कहते हैं /
जिसका ज्ञान होता है, वह द्रव्य कहा जाता है, जो दृष्टता है, वह उपलब्धता भी है, आलोकन
ही दर्शन है और आलोकन में (देखने में) जो कारण है, वह दृग है