Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
चिदणुप्रतिभाकाशपिण्ड एव घनस्थितिः ।
अनुसंधानविवशश्चेततीन्द्रियपञ्चकम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस क्रम से चितिरूप अणुका प्रतिभारूप जो आकाश है, वही घनस्थिति होकर स्थूल देहरूप
बन जाता है, फिर उसमें रूप आदि के अनुसन्धान वश से पाँच इन्द्रियाँ प्रकाश करती हैं