Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
एवं चिदणुसंधानं दृश्यपोषमुपैत्यलम् ।
तदेव ज्ञानमित्युक्तं बुद्धिरित्यभिधीयते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अब चार अन्त:करणों की कल्पना का प्रकार दिखलाते हैं /
इस तरह अणुरूप चिति का ज्ञान दृश्य पदार्थों के बार-बार अनुभव से खूब पुष्ट हो जाता है ।
फिर इसीका नाम ज्ञान एवं बुद्धि पड़ जाता है । इन्द्रियों से अनुभूत विषयों का स्मृति-समय में जो
ज्ञान होता है वह चित्त कहा जाता है और अध्यवसाय समय में जो ज्ञान होता है वह बुद्धि कही जाती
है