Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
ततो मनस्तदारूढमहंकारपदं गतम् ।
देशकालपरिच्छेद इत्यङ्गीकृत आत्मना ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर संकल्पविकल्प दशा में वह मन बन जाता है, अभिमान से-अहंभाव एवं
ममभाव से - अभिमानी होकर अहंकार पद को प्राप्त हो जाता है । इस रीति से आत्मा ने देशकाल
का भी विभाग किया है