Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
व्योम्ना व्योम्न्येव रचितो निर्मलेनेति विभ्रमः ।
असता सत्समास्तीर्णस्तापनद्या जलं यथा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्मल चिदाकाश ने चिदाकाश में ही अपने असत्संकल्प से उक्त
प्रकार के विभ्रम की रचना की है, यह सत् के सदृश होकर ऐसे चारों ओर फैला है, जैसे
(मृगतृष्णा की) ताप-नदी का जल