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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verses 33–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 33-35

संस्कृत श्लोक

संकल्पनामुपादत्ते स्वदेहे गगनाकृतिः । शिरःशब्दार्थदां कांचित्पादशब्दार्थदां क्वचित् ॥ ३३ ॥ उरःपार्श्वादिशब्दार्थमयीं क्वचिदनाविलाम् । भावाभावग्रहोत्सर्गशब्दाद्यर्थमयीमपि ॥ ३४ ॥ नियताकारकलनां देशकालादियन्त्रिताम् । विषयोन्मुखतां यातामिन्द्रियव्रातवेधिताम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

वह गगनरूप चिदणु-जब अपनी देह की कल्पना करनी होती है, तब इस तरह की कल्पना करता है-कहीं कोई कल्पनाएँ सिर शब्द के अर्थ को देनेवाली, कोई पैर शब्द के अर्थ को देनेवाली, कोई छाती, पसली आदि शब्दों के अर्थों को देनेवाली है । वह कहीं निर्मल कल्पना, कहीं भाव, अभाव, ग्रहण, त्याग आदि शब्दों के अर्थो की कल्पना, कहीं नियत काल की कल्पना, कहीं देशकाल से नियन्त्रित कल्पना (दिथक्राल आदि नियमित विक्य की ओर अभिमुख तथा इन्द्रियों के समूह से केधित कल्पना को जीव धारण करता है /), कहीं विषयोन्मुख कल्पना और कहीं इन्द्रियों से युक्त कल्पना करता हे । यों शरीरों के अवयवों की एवं बाह्य अर्थों के हानादि व्यवहारो की कल्पना करता रहता हे । (और यह जीव स्वयं कल्पित हाथ, पर सहित तथा चित्त आदि की कल्पनासहित अपने आकारो को देखता ह १