Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
सोणुः पश्यत्यथाकारमात्मनः स्वात्मकल्पितम् ।
हस्तपादादिकलितं चित्तादिकलनान्वितम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर वह चिदणु अपनी कल्पना से ही कल्पित
अपने हाथ, पैर आदि से युक्त तथा चित्त आदि की कल्पना से युक्त मनुष्य आदि का आकार
देखता है