Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
न च किंचन संपन्नं यथास्थितमवस्थितम् ।
शून्यं शून्ये विलसितं ज्ञप्तिर्ज्ञप्तौ विजृम्भिता ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी तरह की यह कल्पना विथ्या ही हैं, यह कहते हैं /
वास्तव में तो यह कुछ बना नहीं है, किन्तु यह अपने असली स्वरूप में ही स्थित है, शून्य में
शून्य का ही विलास है और चिति चिति में ही बढ़ी है