Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
प्रतिकन्दः शरीराणां बीजं त्रैलोक्यवीरुधाम् ।
सर्गार्गलप्रदो मुक्तेः संसारासारवारिदः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यष्टियों के सदर स्रमष्टिरुप हिरण्यगर्भ श्री उसी तरह अपनी कल्पना से ही बना है, यह
कहते हैं /
भद्र, व्यष्टि शरीरो का जो नियत कन्द (मूल) है, त्रैलोक्यरूप बल्लियों का जो बीज है, वह भी
वही है । मुक्ति के द्वार की प्रतिबन्धक विषय-सृष्टिरूप अर्गला (श्रृंखला) देनेवाला तथा संसाररूप
मूसलाधार वृष्टि करनेवाला मेघ भी वही है