Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
तेनाब्धिमेघसंग्रामसिंहगर्जोर्जितात्मना ।
अपि सुप्तनरेणेव नूनं मौनवता स्थितम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में मेघ, संग्राम और सिंहों की भीषण
गर्जना से युक्तस्वरूप रहने पर भी सुप्त पुरुष वस्तुतः चुपचाप ही स्थित रहता है, वैसे ही विराट्
पुरुष भी प्रपंचशून्य अपने स्वरूप में स्थित है