Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
कुलशैलगुणौघात्मा जगद्धन्दात्मकोऽपि सन् ।
कुलायं धानकामात्रमपि नो पूरयत्यजः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
सात
महाकुल पर्वतों तथा गणों के समूहों का आश्रय एवं ब्रह्माण्डों का समूहमय होकर भी ब्रह्मदेव वट के
बीजमात्र छिद्र को भी पूर्ण नहीं कर सकते