Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
जगत्कोटिशताभोगविस्तीर्णोऽप्यणुमात्रकम् ।
वस्तुतो व्याप्तवानेष न देशं स्वप्नशैलवत् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
सैकड़ों करोड़ लम्बे जगत् के विस्तार से विस्तृत
आकारवान् होते हुए भी ब्रह्मदेव अणुमात्रस्वरूप हैं । स्वप्न के पर्वतं के समान वस्तुतः इन्होंने देश
को व्याप्त नहीं कर रखा है