Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
चित्ताद्ये कल्पितास्तेन बालेनेव पिशाचिकाः ।
तेजःकणा असन्तोऽपि त एते धिष्ण्यतां गताः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
विराट् ने अपने
चित्त से जिनकी कल्पना की वे ही ये तेज के कण, चालक द्वारा अपने चित्त से कल्पित पिशाच की
नाई, असद्रूप होते हुए भी सूर्य, चन्द्र, ग्रह, और नक्षत्र आदि की स्थानता को प्राप्त हुए हैं यानी
तद्रूपता को प्राप्त हुए हैं