Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 73, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 73, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 73 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
वपुर्विराजो जगदङ्ग विद्धि संकल्परूपस्य हि कल्पनात्म ।
आकाशशैलावनिसागरादि सर्वं चिदाकाशमतः प्रशान्तम् ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस संसार को आप विराट् पुरुष का शरीर समझिये । वह भी कल्पनात्मक
उस विराट् की एकमात्र कल्पनारूप ही है । वह न तो कोई बाह्यसाधन से साध्य है ओर न वस्तुतः
मन की कल्पनारूप कुछ है । इसलिए आकाश तथा पर्वत, पृथिवी तथा सागर आदि सबके सब
प्रशान्त चिदाकाश रूप ही है