Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 74, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
अवयवावयविनोरिवेहेन्द्रियचित्तयोः ।
न मनागपि भेदोऽस्ति चैक्यमेकशरीरयोः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
तब इन्द्रिय और मन में भेवव्यवहार क्यों होता हैं, इस पर कहते हैं /
अवयव और अवयवी के सदृश एक शरीरधारी इन्द्रिय और चित्त (मन) में तनिक भी भेद नहीं
है, इन दोनों में एकता ही है