Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 74, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
जगद्विराजोः सत्तैका पवनस्पन्दयोरिव ।
जगद्यत्स विराडेव यो विराट् तज्जगत्स्मृतम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
वायु और उसके स्पन्द के समान जगत् और विराट् पुरुष की सत्ता एक ही है । जो
पृष्टेंष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेषु ।”
(८) अर्थात् मन का ।
(&) इन्द्रियों की कल्पना में इन्द्रिय ही निमित्त हैं, ऐसा तो कभी कह नहीं सकते, क्योकि
ऐसा मानने पर अनवस्था होने लगेगी, यह तात्पर्य है ।
जगत् है वही विराट् है ओर जो विराट् है वही जगत् कहा गया है