Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 74, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मात्मैष स्वसंकल्पं स्वमण्डमकरोद्द्विधा ।
तैजसं तैजसाकारः पुष्टः पुष्टं विहंगवत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस विराटात्मा का चिर. पैर और नितस्व बतलाने के लिए सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड के ऊपर तथा
नीचे के भाग को उसका कपाल (खोपड़ी) तथा पैर बतलाते हैं /
लिंगसमष्टि के अभिमानी चिदाकार पुष्ट उस ब्रह्मात्मा ने अपने संकल्परूप सुवर्णमय अण्ड
का ऐसे दो भाग किया, जैसे अपने पुष्ट अण्ड का पक्षी दो भाग करता है