Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 74, Verses 5–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 74, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
अण्डस्यैकं नभो दूरं गतं संबुद्धवानसौ ।
भुवोधःसंस्थितं भागं व्यतिरिक्तं च नात्मना ॥ ५ ॥
ब्रह्माण्डभाग ऊर्ध्वस्थो विराजः शिर उच्यते ।
अधोभागोऽस्य पादाख्यो नितम्बो मध्यमात्रखम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उस अणु
के ऊपर के एक भाग को उसने ऊर्ध्वगत आकाश समझ लिया तथा नीचे का भाग जो स्थित
था उसे उसने भूलोक मान लिया । अर्थात् उस अणु के दोनों भाग में जो ऊपर का भाग था
वही आकाश तथा नीचे का जो भाग था वह पृथ्वी आदि लोक कल्पित हुआ । यद्यपि उस विराट्
पुरुष ने उन दोनों में आकाश तथा भूलोक आदि की कल्पना की, लेकिन फिर भी अपने से
अतिरिक्त न तो उसने आकाश की कल्पना की ओर न इस भूलोक की ही कल्पना की ।
ब्रह्माण्ड के सबसे ऊपर का जो हिस्सा है वह उस विराट् पुरुष का सिर कहलाता है तथा
नीचे का जो हिस्सा है वह उसका पैर कहा जाता है एवं इन दोनों के बीच का जो अन्तरिक्ष-
आकाश है, वह उस विराट् पुरुष का नितम्ब कहलाता है