Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
पतत्पर्वतनिष्पिष्टप्लुष्टपत्तनमण्डलम् ।
पचत्पचपचाशब्दशब्दिताद्रीन्द्रकुञ्जरम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
वह जले हुए नगरों के मण्डलो को गिर रहे पर्वतों के
द्वारा पीस-पीसकर खूब चूर्णरूप में परिणत कर रहा था ओर पचपच शब्दों से शब्दमय हो रहे
महापर्वतोँ के हाथियों को वह खूब पकाने में संलग्न था