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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 26–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verses 26–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 26-29

संस्कृत श्लोक

गतेन नृत्यतोत्थाय गृहीतगगनांगनम् । अथोदभूज्ज्वलज्ज्वालाकिंशुकांशुकशोभितः ॥ २६ ॥ ताण्डवायेव कल्पाग्निस्तरलोल्मुकमाल्यवान् । तारं पटपटाटोपी रटद्भट इवोद्भटः ॥ २७ ॥ ज्वालोद्भुजो धूमकचो जगज्जीर्णकुटीनटः । जज्वलुर्वनजालानि पुराणि नगराणि च ॥ २८ ॥ मण्डलद्वीपदुर्गाणि जङ्गलानि स्थलानि च । सर्वखानि महाकाशमाशा दश दिवः शिरः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, इसके अनन्तर प्रलयाग्निरूपी नट जगद्रूपी जीर्णं कुटी में ताण्डव नृत्य करने को तैयार हो गया वह जल रही ज्वालारूपी किंशुक पुष्प के वर्ण की तरह वस्त्रों से सुशोभित था, बड़े वेग से फट रहे बंस आदि के कारण पटपट आदि शब्दों के आडम्बर से युक्त था यानी वह उनसे नाना तरह के बाजों का आडम्बर रखनेवाला था । चंचल उल्मुकरूप माला पहिने हुए था, प्रचण्ड एवं वीरोचित शब्दोच्चारण कर रहे योद्धा की तरह अलंकृत दीखता था, प्रज्वलित ज्वालारूपी अपनी लम्बी भुजाओं से समन्वित तथा धूम्ररूपी केशों से वह विभूषित था । उस प्रलय की अग्नि से वनों के समूह, ग्राम, समस्त नगर, मण्डलो के द्रीप-दुर्ग, जंगल, स्थल, पाताल आदि पृथिवी के समस्त छिद्र, पृथिवी के ऊपर का महाकाश, दसो दिशाएँ, भूलोक के ऊपर का हिस्सा-ये सबके सब जलने लगे