Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
शुष्कार्णवसदापक्वविवर्तोग्रजलेचरम् ।
और्वेणाबिन्धनाभावात्प्रोड्डीयेव सहस्रधा ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
सूखे समुद्रो मे उसके द्वारा लगातार सदा पकते
रहने के कारण मगर आदि जल जन्तु परस्पर खूब टक्कर खा रहे थे, इसलिए वे सबके सब देखने
में उस समय बड़े भीषण प्रतीत हो रहे थे । जलरूपी इन्धन न मिलने से बड़वानल मानों उड़कर
स्वयं आकाश में चला गया । वहाँ पहुँचते ही हजारों तरह से नृत्य करते हुए उसने अप्सराओं को
जिससे उछलकर पकड़ लिया, वह बारह आदित्यँ का मण्डल मैंने वहाँ देखा