Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
तर्जनप्रोत्पतद्भूतधानौघा भ्रष्टभूमिका ।
क्वणच्छ्रेणी मृज्जलाग्निर्नानावर्णाननारुणा ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रलयकाल मेँ अपनी छाती पीट-पीट कर रो रही जगत्-लक्ष्मी के हृदयपर स्थापित हुए हाथ
में-अनेक द्वीपो की खोदी गई मृत्तिकाओं, सातां समुद्ररूपी जलों तथा उनमें व्याप्त अग्नियों से,
कंच एवं उसकी कान्ति से युक्त सुवर्णं की जगह पर स्थित नानावर्णो के मुखों एवं मणियों से लाल
हुई यह पृथिवी सुवर्ण विरचित मनोहर शब्द कर रहे-कंकणों की पंक्ति-सी हो गई