Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
प्रलयानलनिर्दग्धमपि हेम न नष्टवत् ।
द्वे हेमनभसी तस्मिन्न नष्टे प्रलयानले ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कस्तु कभी नष्ट नहीं होती वही इस जयत् में सार है, उती की प्रशा करनी चाहिए, इस
अभिप्राय से कहते हैं ।
उस प्रलयकालीन अग्नि मेँ सुवर्ण ओर आकाश ये दो ही नष्ट न हुए । उन्हीं दोनों का शरीर
प्रशंसनीय है, क्योंकि सबका नाश हो जाने पर भी उनका नाश नहीं हुआ