Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
सत्त्वमेकं सुखं मन्ये न रजो न च वा तमः ।
चलदुच्चवनानीव विकीर्णाङ्गारवर्षणः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
मेघरूपी पर्वतों को
जलानेवाला महाधूम्र की ज्वालासहित प्रलयाग्निरूपी वारिद (मेघ) इधर-उधर चल रहे उच्च
जंगलो की नाई आकाश में स्फुरित होता हुआ बिखरे हुए अंगारों की वृष्टि करनेवाला हो गया