Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 75, Verses 57–58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 75, verses 57–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 75 · श्लोक 57,58

संस्कृत श्लोक

दग्धाब्दाद्रिर्महाधूमज्वालोऽभूद्वह्निवारिदः । रसविस्मरणार्तानां शून्यानां स्फारदेहिनाम् ॥ ५७ ॥ शुष्काणां व्योमविटपिपत्राणां पात्ररूपिणाम् । वारिदानां सवारीणां दग्धानां प्रलयार्चिषा ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

सभी तरह के जलों के बिलकुल सूख जाने के कारण यानी संस्कारमात्र भी अवशेष न रह जाने के कारण स्मृति के अभाव से अत्यन्त ही दुःखी, अतः शून्यस्वरूप विशाल शरीरधारी अण्डज आदि चार तरह के जीवों का तथा सर्वथा शुष्क हो जाने से आकाश के वृक्ष के पत्तों के पात्रस्वरूप, प्रलयाग्नि की ज्वाला से दग्ध हुए जलसहित मेघों की हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानाग्नि से दग्ध हुए तत्त्वज्ञानी के दोषों की नाई, कहीं भस्म भी न दीख पड़ी