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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verses 1–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 76, verses 1–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ कल्पान्तमरुति वहत्यवधुताचले । बलेनाम्भोधिकल्लोलैर्नभस्यावर्तकारिणि ॥ १ ॥ समुद्रेषु विमुद्रेषु मर्यादोल्लङ्घने घने । अधनेषु धनिष्वम्बुदारिद्र्योपद्रवद्रुते ॥ २ ॥ भूतले भूतलेशांशवर्जिते वह्निभर्जिते । पातालमपि पाताले गते किमपि कालतः ॥ ३ ॥ दिवि वा विद्यमानायां विशीर्णे सर्गवर्गके । लोके व्योमगतालोके शोकौकसि ककुब्गणे ॥ ४ ॥ कुतोऽप्याकाशकुहराद्दृप्तदैत्यगणा इव । पुष्करावर्तका मेघाश्चक्रुर्गुलुगुलारवम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर जब पर्वतों को कम्पित कर देनेवाला तथा समुद्रतरगों के द्वारा बलपूर्वक आकाशमण्डल में आवर्तं पैदा कर देनेवाला कल्पान्त पवन बह रहा था, समुद्र अपने चिहों से रहित हो गये थे, मेच अपनी मर्यादा एकदम नष्ट कर चुके थे, तथा जल की दरिद्रतारूप दुःख से जब भाग चुके थे, धनी अधनी हो गये थे, भूतल अपने अंश से रहित हो चुका था और अग्नि से भून गया था, कालप्रभाव से पाताल भी किसी (अनिर्वचनीय) पाताल को यानी विनाश को प्राप्त हो चुका था, समस्त सृष्टिवर्ग जीर्ण-शीर्ण हो गया था, विद्यमान अन्तरिक्ष लोक भी आकाशगत प्रकाश में मिल चुका था तथा जब सारी दिशाएँ शोक से व्याप्त हो चुकी थीं, तब किसी एक आकाश के गर्त से क्रुध दैत्यगणों के सदुश निकलकर पुष्करावर्तक नामधारी मेच गुलगुल ध्वनि (गर्जन) करने लग गये

सर्ग सन्दर्भ

पचहत्तरवाँ सर्ग समाप्त छिहत्तरवाँ सर्ग पश्चिम दिशा में, ऊपर के भाग में पुष्करावर्तक (प्रलयमेघ) का उदय तथा आग्नेय दिशा में उपसंहार-यह वर्णन ।