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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 76, Verses 37–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 76, verses 37–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 76 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

सा बभूवाथ साङ्गारजगद्गेहविलासिनी । कृतप्रत्युद्गमा वाष्पश्रियाऽज्वलनया भुवः ॥ ३७ ॥ ज्वालालवोल्ललनडम्बरमम्बरं तद्व्यूढस्थलाब्जदलजालमिवालमासीत् । ज्वालाभ्रमद्भमरपङ्क्तिनिभास्तदासंस्तत्र स्फुरच्छिशिरसीकरपक्षपुञ्जाः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, तदनन्तर अंगारों से युक्त जगत्‌-रूपी घर मेँ विलास करती हुई वह वृष्टि वाष्पशोभा की सखी के सदृश ज्वलनरहित पृथ्वी पर आकर मिल गई