Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
ऊर्म्युद्यदुपलच्छिन्नघनैर्घेस्मरमारुतैः ।
समुद्रघोषैर्निर्घातगम्भीरैर्भग्नदिक्तटम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
उठ रही तरंगो से
ऊपर आकाश की ओर फेंक दिये गये पत्थरों द्वारा मेघो को छिन्न-भिन्न कर देनेवाले प्रलय पवनां
ने उनकी सारी दिशाओं के तटोँ को नष्ट -भ्रष्ट कर दिया