Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
स्वर्गपातालभूर्लोकखण्डखण्डैर्विमिश्रितैः ।
यथास्वभावं तिष्ठद्भिर्मरुबुध्नैर्वृताम्बरम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जल
के अभाव से मरुस्थल के समान हो गये अधोभागवाले अन्तरिक्ष में स्थित हो रहे यानी उड़ रहे
स्वर्ग, पाताल ओर भूलोक के सम्मिलित अनेक खण्डं से वह तीनों लोक आकाश को ढँकने लग
गया