Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तापिच्छविपिनोड्डीतिनिभभस्माभ्रभासुरम् ।
महार्णवमहावर्तवृत्ति धूमविवर्तनम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, उस समय तीनों जगत् उड़ रहे तमालवन के सदृश उड़ रहे भस्मरूप
अभ्र-से भासुर हो गये तथा महासमुद्रो के भ्रमणशील महावतों के सदृश भ्रमणशील धूम्रं से व्याप्त
हो गये