Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
नीलज्वालालवोल्लासहेलाटिमिटिमारटि ।
कृतभस्माभ्रसंभारपूर्णलोकान्तरान्तरम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
गीले काष्ठ आदि के जलने से उनमें कुछ धूप्रयुक्त नील ज्वालाएँ उठ रहीं थी, इन
नील ज्वालाँशों के विलासरूपी क्रीड़ाओं से उनमें टिम-दिमशब्द हो रहे थे उन्होने अपने भस्मरूपी
अभरों के महान् ढेरों से लोकान्तरों के मध्य को भी भर दिया था