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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

उह्यमानशिलाजालप्रहारविलुठत्तटैः । पतल्लोकान्तरैः स्फारदुष्कालकटुटांकृतम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

कल्पान्त पवन से उड़ाये जा रहे शिला-समूहों से जो प्रहार हो रहा था उससे लोकान्तरं के तटग्रान्त लुढक रहे थे और वे गिर भी रहे थे, इससे महादुष्कालजनित कठोर शब्दों से वह सारा त्रैलोक्य व्याप्त हो गया था