Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
पुराण्यमरदैत्यानां भ्रमद्भित्तीनि शातयत् ।
रत्नैः खणखणायन्ति पयांसीव पयस्वताम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिनकी भित्तयो घूम रही थीं, ऐसे देव ओर दैत्यों के नगरों को.जो मेघों के जल
के सदुश रत्नों से खनखन ध्वनि कर रहे थे, उस समय सारा जगत् छिन्न-भिन्न करने लग
गया