Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डभित्तिभांकारभीषणैर्मातरिश्वनः ।
प्रसरैरम्बरोड्डीनदग्धेन्द्रादिपुरोत्करम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्डभित्ति की अन्तिम सीमा तक हो रहे
भांकार शब्दों से अति भीषण वायु के गमनों से आकाशमण्डल में उड़ाये गये दग्ध इन्द्रादिनगरों के
समूह से वह व्याप्त हो गया था