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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । वातवर्षहिमोत्पातपातभग्ने धरातले । जडवेगोऽगमद्वृद्धिं कलाविव महीपतिः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, जब धरातल वायु, वर्षा, हिम ओर अनेक तरह के उत्पातों के आगमन से नष्ट-भ्रष्ट हो गया, तब समुद्र का जलवेग ऐसे वृद्धि को प्राप्त हुआ, जैसे कलि में राजा

सर्ग सन्दर्भ

सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त अठठहत्तरवाँ सर्ग नदी के रूप में गिरनेवाली घनघोर वृष्टिधाराओं से चारों ओर से आकाश को पूर्ण कर रहा जो एक महासमुद्र बढ़ा, उसका विस्तारपूर्वक वर्णन।